भारत की भक्ति परंपरा में संत रविदास का नाम श्रद्धा और समरसता का पर्याय माना जाता है। उनके जीवन से जुड़ी अनेक कथाएं आज भी लोक-स्मृति में जीवंत हैं, जिनमें से एक कथा विशेष रूप से उनकी सच्ची भक्ति और निश्छल हृदय का परिचय देती है।
कहा जाता है कि संत रविदास के गांव से एक विद्वान भक्त गंगा स्नान के लिए जा रहे थे। रविदास जी के घर के सामने से गुजरते हुए उन्होंने बताया कि वे गंगा स्नान करने जा रहे हैं। इस पर रविदास जी ने एक दमड़ी (छोटा सा सिक्का) उन्हें सौंपते हुए कहा कि उनकी ओर से यह गंगा मैया को अर्पित कर दी जाए।
उन सज्जन ने गंगा स्नान के बाद विधि-विधान से पूजा संपन्न की और अंत में रविदास जी की दी हुई वह दमड़ी गंगा के जल में प्रवाहित कर दी। कथा के अनुसार उसी क्षण जल से स्वयं गंगा माता प्रकट हुईं, दमड़ी को स्वीकार किया और बदले में एक रत्नजड़ित स्वर्ण कंगन देते हुए कहा कि यह उनके भक्त रविदास तक पहुंचा दिया जाए।
परंतु उन विद्वान सज्जन के मन में लालच जाग उठा। उन्होंने सोचा कि यदि यह अनमोल कंगन राज्य की महारानी को भेंट कर दिया जाए तो राजा की कृपा सदा बनी रहेगी। वे कंगन लेकर राजदरबार पहुंचे और उसे स्वयं गंगा मैया से प्राप्त होने का दावा करते हुए महारानी के लिए राजा को समर्पित कर दिया।
महारानी को कंगन बेहद पसंद आया, किंतु उन्होंने एक शर्त रख दी, वे अकेला कंगन नहीं पहनेंगी, वैसा ही एक और कंगन गंगा मैया से मंगवाया जाए। राजा ने तुरंत उन सज्जन को आदेश दिया कि वे गंगा माता से दूसरा कंगन लेकर आएं। अब वे भारी संकट में फंस गए, उन्हें भय सताने लगा कि सच्चाई उजागर होने पर राजा उन्हें कठोर दंड देंगे।
घबराए हुए वे सीधे संत रविदास के पास पहुंचे और पूरी घटना बताकर सहायता की गुहार लगाई। रविदास जी मुस्कुराए। वे पेशे से जूते गांठने का काम करते थे और उनके पास लकड़ी की एक कठौती (बर्तन) में जल भरा रहता था। उन्होंने गंगा मैया का स्मरण करते हुए उस कठौती के जल में हाथ डाला और तुरंत वैसा ही एक और कंगन निकालकर सज्जन को सौंप दिया।
रविदास जी की भक्ति में इतनी शक्ति थी कि गंगा मैया साधारण कठौती के जल में ही प्रकट हो गईं। तभी से यह कहावत लोक-जीवन में रच-बस गई, "मन चंगा तो कठौती में गंगा", अर्थात यदि मन शुद्ध और निश्छल हो तो साधारण से साधन में भी दिव्यता उतर आती है।
*(संदर्भ: यह प्रसंग संत रविदास से जुड़ी लोक-प्रचलित कथाओं में सबसे अधिक उद्धृत किया जाता है और उनकी शिक्षाओं की आज भी उतनी ही प्रासंगिकता है, जितनी सदियों पहले थी।)*
नोट: यह कथा संत रविदास से जुड़ी लोक-प्रचलित जनश्रुति पर आधारित है। इसका उद्देश्य उनके जीवन-दर्शन और भक्ति के संदेश को प्रस्तुत करना है।

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